इस देश में क्या हिन्दुओं की आवाज दबाई जा रही है, जानें क्यूँ हताश हैं हिन्दू युवा?

इस देश में क्या हिन्दुओं की आवाज दबाई जा रही है? सनातन धर्म के सभी वर्गों से इस सवाल का जवाब ‘हां’ ही मिलेगा। किसी भी हिंदू युवक या युवती से पूछें और वे आपको बताएंगे कि वे न केवल सरकार की शैक्षणिक संस्थानों में बल्कि रोजगार के अवसरों में आरक्षण की नीति के साथ कैसे हताश हैं।

किसी बुजुर्ग से पूछिए जो मस्जिदों के इलाके में रहता है, दिन के हर व्यस्त घंटे में आती अजीबो गरीब आवाजों से परेशान होने के कारण अपनी हताशा को निकाल देगा, लेकिन लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करने के लिए बोलने की हिम्मत नहीं कर पाता! लाउडस्पिकर 10 बजे कानूनी तौर पर रोक देते हैं मगर केवल क्रिसमस की पूर्व संध्या पर!

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अल्पसंख्यकों के लिए हिन्दुओं के अधिकार छीने जा रहे 

अल्पसंख्यकों को द्वितीय श्रेणी के नागरिकों जैसा न महसूस हो, इस प्रयास में बहुसंख्यक अपने सामाजिक अधिकार न्याय के नाम पर अल्पसंख्यकों के लिए हार रहे हैं। अल्पसंख्यक समूह के एक आईएएस अधिकारी का बेटा प्रतिष्ठित नौकरी के लिए दावा कर सकता है; अपने पिता की सामाजिक और आर्थिक स्थिति के कारण उन्होंने किसी चीज़ की कमी नहीं होती।

अल्पसंख्यकों सर पर चढाने का ही उदाहरण है कि वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा क्रिसमस के दिन ‘सुशासन दिवस’ मनाए जाने के फैसले पर बुद्धिजीवी भारतीयों द्वारा खुब आलोचनाएं की गयी। भारतीय मीडिया ने टी वी स्टूडियो में ‘मेरी क्रिसमस’ की बधाई देकर स्कुलरिस्ज्म की निष्ठा बरकरार रखी, वरना वो छुट्टी न होने के कारण खतरे में आ गयी थी।

इंग्लैंड जैसे धर्मनिरपेक्ष देशों और भूटान जैसे गैर धर्मनिरपेक्ष देशों में पूर्व राजनयिक रह चुके कथित सेक्युलर पवन वर्मा ने अपने सभी अनुभवों के साथ यह सुझाव दिया कि धार्मिक छुट्टियां भारत की धर्मनिरपेक्ष स्थिति को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

लेकिन पवन वर्मा जवाब दें कि क्या ब्रिटेन और अमेरिका धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं? अगर यही धर्म निरपेक्षता का पैमाना है तो क्यों वहां दीवाली के लिए छुट्टियां नहीं हैं. भले ही वे इसे किसी और या किसी अन्य रूप में पहचानते और मनाते हैं, न केवल अनौपचारिक लेकिन औपचारिक रूप से।

यह देखते हुए कि भारत दुनिया के प्रमुख धर्मों का घर है, यह किसी भी सरकारी परिपत्र में राजपत्रित छुट्टियों की सूची को देखने के लिए आश्चर्य की बात नहीं है। अल्पसंख्यकों के नाम पर भारत में इस तथ्य को पूरी तरह से अनदेखा किया गया है कि किसी को क्रिसमस, ईद या उस दिन दिवाली की भावना का जश्न मनाने के लिए छुट्टियों की ज़रूरत नहीं है।

भारत की छवि भारतीय टीवी चैनलों की हिन्दू विरोधी चर्चा पर निर्भर नहीं 

कुछ लोग कहते हैं कि हम असहिष्णुता के दबाव में दुनिया को एक गलत संदेश भेज रहे हैं। सौभाग्य से या दुर्भाग्य से, दुनिया को भेजे जाने वाला संदेश प्रभावी रूप से उन पश्चिमी देशों में रहने वाले भारतीयों द्वारा किया जाता है। भारत की छवि भारतीय टीवी चैनलों पर चर्चा की तुलना में विदेशों में रह रहे हिन्दुओं के रहन-सहन पर आधारित है।

पूरी दुनिया में भारतीयों को अपने उद्यमी के लिए सम्मानित किया गया है, उनके बच्चों के शानदार शैक्षणिक परिणाम और उनके पारंपरिक भोजन, कपड़े और विश्वास को तरह उनकी समृद्धि का जिक्र हर जगह होता है।

हर जगह मर रहे हिन्दुओं के लिए क्यूँ कोई बात नहीं करता? 

हर जगह धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर बहस और चर्चा की बात होती है, लेकिन क्या क्कोई ये बात करता है कि बहुसंख्य हिंदुओं के बारे में भी बात होनी चाहिए! पाकिस्तान या बांग्लादेश या बर्मा में, और भारत के केरल और बंगाल में भी मर रहे हिन्दुओं के लिए क्यूँ कोई बात नहीं करता? क्यूँ कोई हिन्दू लड़कियों के खिलाफ लव जिहाद की साजिश की बार नहीं करता?

वर्तमान परिदृश्य में निश्चित रूप से इसकी जड़ें अतीत में हैं, शायद, जब राष्ट्र निर्माण का बीज बोया गया था, हमारे कथित सेक्युलर हिंदू नेताओं ने विभाजन के दौरान हिन्दुओं की लाशों पर आँख मूंदते हुए फैसला लिया कि धर्म के नाम पर भारत में कोई भेदभाव नहीं होगा। यही वजह है कि अल्पसंख्यकों को बार बार यह विश्वास दिलाया जाता है कि उन्होंने भारत में रहकर उनकी राजनितिक पार्टियों पर एहसान किया है।

हिन्दू सुरक्षित नहीं तो भारत भी सुरक्षित नहीं रहेगा 

भारत के राजनेताओं ने अपनी राजनीति के लिए अल्पसंख्यकों के अपने वोट बैंक को बढ़ाने के लिए इस रणनीति का फायदा उठाया। आखिरकार एक ऐसी स्थिति सामने आई जब राजनीतिक दल एक धार्मिक समूह या किसी अन्य के साथ संबंधित हो गए! अल्पसंख्यक अधिकारों की धर्मनिरपेक्षता और संरक्षण के पूरे विचार के आगे हिंदू धार्मिक समूह को ही नकार दिया जाने लगा।

हिन्दू ही आज के समय में अपने धर्म को लेकर बेहोश स्थिति में हैं। जब वो जागेगा तो समझेगा कि धर्मनिरपेक्ष भारत में उन्हें अल्पसंख्यकों को विशेषाधिकार के सामने अपने धर्म को जीवित रखने के साधारण नियम जैसे पाठ-पूजा तक के लिए लड़ना पड़ रहा है।

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हिन्दुओं को अब याद रखने की आवश्यकता है कि अगर सेक्युलर है तो हिन्दू धर्म की कोई जगह नहीं! उनका हर कानून यहाँ तक कि शिक्षा, रोजगार, विवाह आदि सब खतरे में हैं। अगर भारत को जीवित रहना है तो भारत में हिंदू सहित सभी को हिन्दुओं के लिए आवाज़ उठाने की जरूरत है। याद रखना होगा कि जब हिन्दू सुरक्षित है, तब तक ही देश भी सुरक्षित है, वरना जिहाद और नास्तिकवाद की गूंज से ऋषि मुनियों की धरती को अधर्म और हिंसा बर्बाद कर देगी!!

लेखक : आरके पंडित 

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