ये है महाभारत की सबसे विचित्र कहानी, जिससे अब तक अनजान थे लोग … 

महाभारत के बारे में कहा जाता है कि यह मात्र एक युद्ध नहीं था, बल्कि कर्म-धर्म के माध्यम से जीवन का सार दुनिया के सामने लाने के लिए भगवान श्री कृष्ण की रची लीला थी। महाभारत के दौरान घटित हर कहानी अपने आप में एक जीवन प्रेरणा है। एक ऐसी ही कहानी आज हम बताने जा रहे हैं, जो बेहद विचित्र तो है ही और साथ में इससे ढेरों लोग अनजान भी होंगे। आओ जानें …

बता दें कि ये कहानी है पांचों पांडवों के जन्म की, जिसमें उनके जन्म पिता के होते हुए भी उनका जन्म एक अनोखे रूप में हुआ था। इस कहानी अनुसार जब एक बार राजा पांडु अपनी दोनों पत्नियों कुंंती तथा माद्री के साथ आखेट के लिए वन में गए तो वहां कुछ ऐसा घटित हुआ, जिसे भगवान की लीला ही कहा जा सकता है।

साभार : i9.dainikbhaskar.com

पांडू को मिला एक श्राप 

बता दें कि वन में मृग का संबंध बनाता जोड़ा दिखते ही पांडु ने तत्काल अपने बाण से उस मृग को घायल कर दिया। मगर मरने से पहले मृग ने पांडु को शाप दिया कि ” उनके समान क्रूर पुरुष इस संसार में कोई भी नहीं होगा और कहा कि उन्होंने उसे संबंध बनाए के समय बाण मारा है अतः जब कभी भी वह संबंध बनायेंगे तो उनकी मृत्यु हो जाएगी।”

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शाप के बाद अत्यन्त दुःखी पांडु ने रानियों से कहा कि वे अब अपनी समस्त वासनाओं का त्याग कर के इस वन में ही रहेंगे और रानियों को हस्तिनापुर लौट जाने को कहा। जिस पर दोनों रानियों ने दुःखी होकर कहा कि वे उनके बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकतीं और उन्हें भी वन में अपने साथ रखने की प्रार्थना की, जिसे पांडु ने स्वीकार भी कर लिया।

एक बार अमावस्या के दिन राजा पांडु ने ऋषि-मुनियों को ब्रह्मा जी के द्वार जाते हुए देख, अपने साथ उन्हें भी ले जाने का आग्रह किया। मगर ऋषि-मुनियों ने बताया कि कोई भी निःसंतान पुरुष ब्रह्मलोक जाने का अधिकारी नहीं है और उन्हें अपने साथ ले जाने में असमर्थता जताई।

पुत्र जन्म और श्राप से मृत्यु ..

अपने पति की बढ़ती चिंताओं को देख एक बार कुंती ने राजा पांडू को बताया कि दुर्वासा ऋषि ने उन्हें ऐसा मंत्र प्रदान किया है जिससे वे किसी भी देवता का आह्वान करके मनचाही इच्छा पूरी कर सकती है। यह सुन पांडु ने धर्म को आमंत्रित करने का आदेश दिया, जिन्होंने कुंती को एक पुत्र प्रदान किया जिसका नाम ही युधिष्ठिर रखा गया। इसके बाद उन्हें वायुदेव से भीम तथा इंद्र देव से अर्जुन की उत्पत्ति हुई। अश्वनी कुमारों के आशीर्वाद से माद्री ने भी नकुल तथा सहदेव को जन्म दिया।

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मगर कुछ समय पश्चात पांडु का मन चंचल हो उठा और वे श्राप भूलकर, वैवाहिक संबंध बनाने ही जा रहे थे कि श्राप के असर से उनकी मृत्यु हो गई। इस दौरान रानी माद्री भी उनके साथ सती हो गई मगर पुत्रों के पालन-पोषण के लिए कुंती वापस हस्तिनापुर लौट गयी।

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