हुआ साबित, देश के वामपंथी और नास्तिक हैं नाजायज़ डीएनए

सबसे पहले तो मैं जो शब्द लिखने जा रहा हूँ, उसके बाद ही वामपंथी और नास्तिक ये लेख को अधूरा छोड़ यहां से जा सकते हैं। वो शब्द है – “जय श्री राम”। अब भी जो वामपंथी और नास्तिक इस लेख को आगे पढ़ना चाहते हैं तो बरनोल का इंतजाम कर लीजिए, आपको जरूरत पड़ सकती है।
जेएनयू छाप वामपंथी अपने डीएनए का प्रदर्शन करते हुए

भारत को हिन्दू राष्ट्र कहने पर दूसरे धर्म के लोगों का दर्द समझ आता है, मगर वामपंथी एवं नास्तिक का डीएनए क्यों फड़फड़ाता है, आज हम इसका डीएनए विश्लेषण करेंगे। यकीनन इस लेख के बाद इस लेख के समर्थक एवं विरोधी भी समझ जाएंगे कि वामपंथी एवं नास्तिक का डीएनए नाजायज़ है।

भारत कब आजाद हुआ? अब आप सोचेंगे कि ये क्या बकवास है। साबित क्या करना था और कह क्या रहा है! अरे भई ये सवाल उन लोगों के लिये जिन्हें वाकई सोचने कि आवश्यकता है कि 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हो गया था। 14 अगस्त तक भारत अंग्रेजों का गुलाम था। यानीं 1600 में अंगेज भारत आये थे और 1857 तक भारत अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों में था।

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मगर क्या भारत अंग्रेजों की गुलामी से पहले आजाद था? क्या मुगलों ने और बाकि इस्लामिक आक्रमणकारियों ने भारत को गुलाम नहीं बनाया था? बेशक संपूर्ण गुलामी भारत की कभी नहीं हुई, लेकिन कभी कहीं राज्य या क्षेत्र गुलाम होते थे कभी कहीं आजाद भी होते थे। बस खण्ड खण्ड बंटे होने के कारण भारत एक होकर गुलामी से बाहर नहीं आ पाया।

बात भारत की आजादी और गुलामी की नहीं है। बात है उस दौर की, जब हम गुलाम थे। यानीं जो वामपंथी और नास्तिक पता नहीं किस दौर में सवर्णों के दलितों पर गुलामी की बात करते हैं, जबकि उन्हें उस दौर की गुलामी की टीस कभी महसूस नहीं होती जब बैलों की जगह लोगों को हल में जोता जाता था, अपनी ही जमीन से अन्न का 90% हिस्सा तक कर में देना पड़ता था, खासकर आज के कथित दलितों से उनके वर्ण अनुसार काम उसी दौर में छीने गए।

होगी कैसे उनके पूर्वज वो लोग थे जिन्होंने विदेशियों को अपनी घर की औरतें पैसों में तोल दी थी और आज जो वामपंथी नास्तिक उन्हीं विदेशियों के डीएनए हैं। अब सबूत तौर भी साबित तो उन वामपंथी और नास्तिकों को करना है कि उनका डीएनए सिर्फ उनके माँ बाप से ही मिलता है। है न मुश्किल काम? तो जिस भारतीय इतिहास को तुम्हारे पूर्वजों ने (मतलब लेख के अंत में जो खुद को अभी भी वामपंथी या नास्तिक कहें) बदल दिया था, उसे सही तो किया जाएगा।

तब महाराणा प्रताप की अकबर पर विजय की सत्यता को शिक्षा में पुनः शामिल करना हो या, जो इतिहास को का शुद्ध रूप 70 साल लेट हो गया, वो काम अब आजाद भारत मे क्यों न हों। सिर्फ महाराणा का इतिहास नहीं संपूर्ण हिन्दू इतिहास का सच अब सामने आने का समय हो चुका है।

तो इस सच को झूठ बताने वाले अकबर जैसे विदेशी मुगलों के समर्थक हुए न नाजायज़, जो इसे शिक्षा का भगवाकरण कहकर अपना डीएनए नाजायज़ साबित कर रहे हैं और साबित कर रहे हैं कि कुछ पीढ़ी पहले इनके पूर्वजों ने अपनी घर की औरतों को अकबर जैसे विदेशियों के हाथों तोल दिया था। अगर किसी वामपंथी या नास्तिक ने ये लेख पूरा पढा है तो वो साबित करे कि वो नाजायज़ डीएनए नहीं है और उसके लिए उसे अपना डीएनए तमाम विश्व के डीएनए से मैच करवाना होगा।

अब अगर कोई वामपंथी इस लेख का विरोध भले ही करे मगर वो अपना डीएनए जायज़ साबित नहीं कर सकता तो वो मुगलों-अंग्रेजों के दौर में लिखे इतिहास का समर्थन कैसे कर सकता है? और अगर फिर भी कोई ये साबित करने की हिम्मत रखता है, तो मैं इस लेखक भी स्वीकार कर लूंगा कि महाराणा प्रताप सच मे अकबर से हार गया था! अगर साबित नहीं कर सकते तो चैन से दिन गुजारो, क्यूंकि जिस लोकतंत्र का तुम विरोध करते हो, उसी लोकतंत्र ने हिन्दुओं के हाथ बाँध रखे हैं! वो क्या है हम हिन्दू जिहाद भी नहीं करते वरना ….. !!!

लेखक – आरके पंडित 

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