आखिर क्यों सफ़ेद कपड़े पहनती हैं विधवा, जानें इसके पीछे का कारण ..

भारत में अनेक धर्मो ने जन्म लिया है, चाहे बेशक वह बौद्ध धर्म हो या जैन धर्म या हिन्दू धर्म. हमारा भारत एक परंपराओं का देश है, यहां हर दुसरे कदम पर आप नई कला और संस्कृति से रूबरू होते हैं। इन्हीं में से एक परंपरा है की विधवाओं का रंगीन कपड़े ना पहनना। हमेशा यह सवाल इंसान के जेहन में जरुर आता होगा कि ऐसा आखिर क्यों हैं?

ये एक बहस का विषय भी है कि अगर किसी महिला का पति उसका साथ छोड़कर इस दुनिया से चला जाये तो सारी उम्र उस महिला को वनवास के रूप में क्यों जीना पड़ता है, यह कहां तक उचित है। बदलते दौर के बीच विधवाओं को सम्मान भी मिलने लगा है, उन्हें काफी आजादी मिल रही है और कई जगहों पर पुनर्विवाह भी हो रहे है. परन्तु स्थिति अभी भी पूरी तरह बदलने में थोडा वक्त जरुर लगेगा।

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आइये जानें, इस बारे में क्या तर्क देते हैं बुद्धिजीवी .. 

कुछ बुद्धिजीवियों का इस बारे में मानना है कि इस बारे में शास्त्रों में भी विधवाओं की दोबारा शादी का प्रावधान बिलकुल नहीं लिखा है. उनके अनुसार विधवा महिलाओं को कुछ नियम मानने चाहिए, जिनके पीछे कई ठोस कारण भी बताये जाते हैं। उनका तर्क है कि विवाह के बाद पति को परमेश्वर भी कहा जाता है तो अगर ऐसे में परमेश्वर का ही जीवन समाप्त हो जाए, तब महिलाओं को इस संसार की मोह-माया छोड़कर बस भगवान में मन लगाना चाहिए।

इस बारे में उनका कहना है कि महिलाओं का ध्यान ना भटके इस कारण ही उन्हें सफेद वस्त्र पहनने को कहा जाता है. इस पीछे कारण दिया जाता है कि रंगीन कपड़े इंसान को भौतिक सुखों के बारे में व्याख्या करते हैं. अगर ऐसे में महिला का पति ही साथ न हो तो महिलाएं कैसे उन चीजों का इस्तेमाल करेगी. बस इस बात के चलते ही विधवाओं को सफेद कपड़े पहनने के लिए कहा जाता है।

बता दें कि देश में आज भी कई जगह ऐसी हैं, जहां आज भी विधवाओं के बाल तक काट दिये जाते हैं. ऐसा करने के पीछे माना जाता है कि केश महिलाओं का श्रृंगार होता है जो कि उनकी खूबसूरती को बयां करता हैं। बस किसी पराये पुरूष की नजर उनकी इस सुंदरता पर ना पड़े, इस कारण उनके बाल ही काट दिये जाते हैं.

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ये सब परम्परायें सदियों से चली आ रही है. कुछ धर्म संगत हैं तो कुछ अपनाई हुयी. ये सब उन लोगों पर ही छोड़ देना चाहिए जो इन्हें मानते हैं कि वो इन्हें मानें या न मानें. याद रहे किसी की मान्यता और धर्म पर हस्तक्षेप करना उसकी आस्थाओं का अपमान करना है, जो कि बेहद गलत कार्य है!!

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